SJS&PBS

स्थापना : 18 अगस्त, 2014


: मकसद :

हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!!


: अवधारणा :


सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी!

Social Justice, Secularism And Pay Back to Society-SJS&PBS


: सवाल और जवाब :


1-बहुसंख्यक देशवासियों की प्रगति में मूल सामाजिक व्यवधान : मनुवादी आतंकवाद!

2-बहुसंख्यक देशवासियों की प्रगति का संवैधानिक समाधान : समान प्रतिनिधित्व।


अर्थात्

समान प्रतिनिधित्व की युक्ति! मनुवादी आतंकवाद से मुक्ति!!


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17.11.14

हक रक्षक दल की कार्यशाला से बाहर निकलने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया

हक रक्षक दल की कार्यशाला से बाहर निकलने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया

निवाई-टोंक। एम. के. मेमोरियल स्कूल, खणदेवत रोड़, जमात, निवाई, में 16 नम्बर, 2014 को को हक रक्षक दल की एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य रूप से हक रक्षक दल के प्रमुख डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’, उप प्रमुख डीएस देवराज, राजस्थान प्रदेश प्रभारी विमल कुमार मीणा आदि ने सम्बोधित किया।

कार्यशाला का आयोजन हक रक्षक दल के स्थानीय प्रतिनिधि बाबूलाल मीणा, आलोक मीणा, बुधराम मीणा, तेजराम मीणा और उनके अनेकानेक सहयोगियों ने किया। जिसमें स्थानीय युवा और बुजुर्गों के साथ-साथ टोंक, कोटा, दौसा और जयपुर जिले के हक रक्षकों न सक्रिय रूप से भाग लिया।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में सुप्रसिद्ध लेखक एवं चिन्तक और हक रक्षक दल के प्रमुख श्री डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ जी का कार्याशाला में उपस्थित समाज के वयोवृद्ध श्री रामकुमार मीणा जी ने माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। साथ ही उपमुख्य प्रमुख श्री डीएस देवराज, प्रदेश प्रभारी श्री विमल कुमार मीणा, कोटा के हक रक्षक प्रतिनिधि शशि मीणा का भी आयोजकों ने माल्यार्पण करके स्वागत किया। 

कार्यशाला का प्रारम्भ करते हुए डॉ. निरंकुश जी ने कार्यशाला में उपस्थित नये लोगों से सीधा सवाल किया कि कितनों को ज्ञात है कि-मीणा-मीना विवाद क्या है? जिस पर अधिकांश ने अनभिज्ञता जताई और कुछ ने कहा कि केवल बोलने और लिखने का फर्क है, बाकी कोई फर्क नहीं है।

डॉ. निरंकुश जी ने सवाल किया कि मीणा जाति में वैवाहिक रिश्तों का समाधान करने का अधिकार मीणा समाज के पंच पटेलों के पास क्यों है और समाज के पंच पटेलों द्वारा वैवाहिक मामलों के निपटारे को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, क्यों? मगर किसी के पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था।

डॉ. निरंकुश जी ने जब सवाल किया कि कितनों को जानकारी है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधान आदिवासियों के ऊपर लागू नहीं होते हैं, क्योंकि हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, तो लोगों के बीच सन्नाटा छा गया।

इस प्रकार के कुछ सवालों के साथ डॉ. निरकुश जी ने मीणा-मीना विवाद पर कार्यशाला की शुरूआत की तो उपस्थित लोग आश्‍चर्यचकित होकर डॉ. साब की एक-एक बात को ध्यान से सुनते रहे। बीच-बीच में डॉ. निरंकुश जी ने उपस्थित लोगों से कुछ रोचक और ज्ञानवर्धक सवालों के जवाब भी पूछे, लोगों को भी सवाल पूछने को प्रेरित किया और लोगों को परिवार के सदस्यों की भांति अपने साथ जोड़ लिया। ऐसी-ऐसी जानकारियॉं लोगों को दी, जिनके बारे में लोगों को तनिक भी जानकारी नहीं थी। डॉ. निरंकुश जी को सुनने के बाद कार्यशाला में भाग लेने वालों की निम्न प्रतिक्रियाओं को पढकर कार्यशाला कैसी रही होगी, इस बात का सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है।

सेवानिवृत सत्तर वर्षीय फौजी : मेरे जीवन में मैंन कभी सोचा भी नहीं था कि मीणा समाज में डॉ. पुरुषोत्तम मीणा के रूप में ऐसा व्यक्ति भी मौजूद है, जिसे आजादी से पहले से मीणा-मीना विवाद तक की आरक्षण सम्बन्धी सभी संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक बातों की जानकारी पर इतनी अच्छी पकड़ है। हम तो डॉ. साहब को सुनकर धन्य हो गये।

क 25 वर्षीय युवा : आज डॉ. साहब को नहीं सुनता तो मैं बहुत बडे़ ज्ञान से वंचित रह जाता। डॉ. साहब ने हमें जो जानकारियां दी हैं, उनसे हमें पहली बार पता चला है कि हमारे समाज की असली समस्या क्या हैं!

एक अध्यापक : डॉ. साहब को सुनकर आँखों की और दिमांग की धूल साफ हो गयी। डॉ. साहब ने हमें सच का आईना दिखा दिया। आज हम नहीं आते तो बहुत बड़ी भूल होती।

एक अन्य युवा : डॉ. साहब ने जिस तरीके से लगातार चार घंटे तक जानकारी दी है, उसे सुनकर तो हमारी आंखें खुल गयी है और इस बात का अहसास हो गया है कि मनुवादी और राजनेता हमें लगातार गुमराह करते आये हैं।

एक अन्य कर्मचारी : डॉ. साहब ने जो जानकारी दी हैं, उनकोे हमें गॉंव-गॉंव तक पहुंचाना होगा। डॉ. साहब का हक रक्षक दल रूपी ज्ञान और जागरूकता अभियान अब रुकने वाला नहीं है। हम इसे हर जगह पहुंचायेंगे।

एक अन्य बजुर्ग : मुझे तो पता ही आज चला है कि मीणा-मीना विवाद की हकीकत क्या है? आज से पहले तो बस यही समझता था कि लिखने और बोलने का ही फर्क है।

कार्यशाला के दौरान श्री डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी और उप प्रमुख श्री डीएस देवराज जी की अनुमति से राजस्थान प्रदेश प्रभारी श्री विमल कुमार मीणा जी ने करौली जिले के युवा और जुझारू सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रामलखन मीणा जी को हक रक्षक दल का राजस्थान प्रदेश प्रभारी (युवा प्रकोष्ठ), श्री आलोक मीणा जी को टोंक जिला अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) और श्री बुधराम मीणा जी को निवाई तहसील अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) नियुक्त किया गया। उपस्थित सभी लोगों ने नवनियुक्त पदाधिकारियों का कर्तलध्वनि से स्वागत करते हुए माल्यार्पण करके उनका सम्मान भी किया। नवनियुक्त पदाधिकारियों ने हक रक्षक दल की आवाज को जन जन की आवाज बनाने का विश्‍वास दिलाया। उपस्थित सभी लोगों ने एक स्वर में हक रक्षक  दल के पदाधिकारियों का सहयोग करने का आश्वासन दिया।  

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी कार्यशाला से निकलने के बाद हर कोई डॉ. साहब के विचारों के बारे में चर्चा करने में मशगूल देखा गया। यही हक रक्षक दल के नेतृत्व की ऐसी अनोखी प्रतिभा और क्षमता है, जिसके कारण लगातार हक रक्षक दल का कारवां हर दिन बढता ही जा रहा है।

12.11.14

जागो, जगाओ, सच बताओ और अपना सामाजिक दायित्व निभाओ!

#माधुरी #पाटिल केस की #असंवैधानिक #सिफारिशों के #साईड-इफेक्ट प्रारम्भ
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मीणाओं के #जाति-प्रमाण-पत्र नहीं बनाने के लिए-करौली जिला #कलेक्टर
ने #माधुरी-पाटिल-केस की #मनमानी #सिफारिशों की आड़ लेना शुरू किया!
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#मनुवादियों, #पूंजीपतियों और #काले-अंग्रेजों द्वारा #प्रायोजित #मीणा-मीना विवाद के चलते आज मीणा समाज जिस #दिशा-विहीन किया जा चुका है। जिससे मीणा-समाज को उबारने की संवैधानिक जिम्मेदारी मीणा समाज के #निर्वाचित #जन-प्रतिनिधियों और #संविधान के #अनुच्छेद 16 (4) के तहत #आरक्षण का लाभ लेकर #शासकीय-सेवा में सेवारत मीणा समाज के #मीणा-लोक-सेवकों की है!

इन दोनों तबकों में से कौन किस तरह से अपनी इस #संवैधानिक और #सामाजिक-जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहा है। कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है।  सब कुछ समाज के सामने है।

हमारे बीच प्राम्भ से ही समाज की सेवा करने वाले भी मौजूद रहे हैं। जिनसे  समाज को अत्यधिक उम्मीद रही है। मगर  समाज की सेवा के नाम पर समाज सेवियों द्वारा समाज का जैसा मार्गदर्शन किया जा रहा है। वह भी समाज के सामने है!

1- @मनुवादियों के #मानसिक-शिकंजे में कैद कुछ मीणा #जनप्रतिनिधियों द्वारा मीणा समाज को लगातार गुमराह और भ्रमित किया जा रहा है। जिसके चलते समाज की जाग्रति और एकता बाधित और विखंडित हो रही है। जिसका ताजा उदाहरण है, मीडिया के माध्यम से यह बयान जारी करना कि-

"मीणाओं के #जाति-प्रमाण-पत्र बनाने पर रोक हटी।"
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रोक 30 सितमबर, 2014  के राज्य सरकार के आदेश द्वारा लगाई गयी थी जो आज तक नहीं हटी है।
बल्कि कड़वा सच तो ये है "मीना" नाम से भी अनेकों जगह #जाति-प्रमाण-पत्र जारी नहीं किये जा रहे हैं।   

2- कथित बुद्धिजीवी मीणा समाज सेवियों द्वारा #संचालित-स्वघोषित-सर्वेसर्वा-संगठन के अदूरदर्शी और आत्मघाती प्रयासों का दु:खद दुष्परिणाम है-

"सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी #माधुरी-पाटिल-केस की न्याय के नाम पर #अन्यायपूर्ण और #असंवैधानिक सिफारिशों को राजस्थान में लागू करवाने के लिए #न्यायिक-प्रयास करना।"

जिसके चलते "मीना/Mina" जाति के नाम से पहले जारी किये जा रहे #जाति-प्रमाण-पत्र बनना भी लगभग असम्भव बना दिया गया है। #सुप्रीम-कोर्ट के निर्णय का असली #निहितार्थ (Hidden Agenda) भी यही था। जिसे समझने में कहाँ और क्यों चूक हुई ये तो मुझे नहीं पता मगर " #माधुरी-पाटिल-केस की न्याय के नाम पर #अन्यायपूर्ण और #असंवैधानिक सिफारिशों को राजस्थान में लागू करवाने के लिए न्यायिक प्रयास करना।" मीणाओं के हितों पर मनुवादियों द्वारा किये गए कुठाराघात ( #मीणा-मीना-विवाद) से हजार गुना मूर्खतापूर्ण कार्य (यदि अनजाने में किया गया है तो) है। अन्यथा यह समस्त आरक्षित वर्गों के विरूद्ध किया गया अक्षम्य ऐतिहासिक अपराध है।

जिसके #दुष्परिणाम तुरंत सामने आ चुके हैं :
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1- #समता-आंदोलन-समिति की चुनाव आयोग से मांग : स्थानीय निकाय चुनावों में और पंचायत चुनावों में माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों के अनुसार निर्धारित रीति से जारी किये गए #जाति-प्रमाण-पत्र ही स्वीकार किये जाएँ। विशेषकर मीणाओं के बारे में कहा गया है।

2- करौली जिला कलेक्टर का कहना है कि यदि समस्त रिकॉर्ड (रेवन्यू, शैक्षिक, वोटर-लिस्ट, राशन कार्ड आदि में) केवल मीना (Mina) लिखा है तो ही मीना जाति का #जाति-प्रमाण-पत्र जारी किया जायेगा। वो भी केवल हिन्दी में मीना नाम से, मार्कशीट में नाम के साथ Meena लिखे को करौली कलेकटर और नादौती तहसीलदार मीणा मानते हैं। किसी को शक हो तो करौली कलेक्टर और नादौती तहसीलदार से बात की जा सकती है।

नोट : " #माधुरी-पाटिल-केस की न्याय के नाम पर जारी की गयी #अन्यायपूर्ण और #असंवैधानिक-सिफारशें कलेक्टर को इसी प्रकार के #असंवैधानिक और #मनमाने #अधिकार प्रदान करती हैं।"

अब हम मीणाओं को तीन मोर्चों पर लड़ना होगा :
इन विकट हालतों में #मीणा-समाज के लोगों को तीन मोर्चों पर लड़ना होगा-
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पहला : #मनुवादियों से जिनके हजारों चेहरे हैं, मगर ऑन रिकॉर्ड - समता आंदोलन समिति है। जिसकी हर मनुवादी चाल का जवाब देना होगा। 
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दूसरा : उन मीणा मनुवादी समाज सेवकों (जन प्रतिनिधियों और समाजसेवियों) को मीणा समाज का हित और संवैधानिक  सत्य बताना होगा और यदि संभव हो तो उनका सकारात्मक साथ लेना होगा, जो ना जाने क्यों मीणा समाज को गुमराह और भ्रमित कर रहे हैं।
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तीसरा : #माधुरी-पाटिल-केस की न्याय के नाम पर #सुप्रीम-कोर्ट द्वारा जारी की गयी #अन्यायपूर्ण और #असंवैधानिक-सिफारिशों को निरस्त करवाना होगा, जो सरकार और अफसरों को आरक्षित वर्गों के विरुद्ध असंवैधानिक और मनमाने अधिकार प्रदान करती हैं।" इनको निरस्त करवाना #मीणा-मीना विवाद से भी अधिक जरूरी है।  

इस तीनों कार्यों के लिए #हक-रक्षक-दल (HRD) के रक्षकों और लाखों समर्थकों को खुलकर आगे आना होगा और अपना सामाजिक दायित्व निभाना होगा। जो बहुत बड़ी और कठिन चुनौती है। मगर असम्भव नहीं है।

--सबसे पहला काम मीणा समाज को गुमराह होने से बचाना और सत्य को बताना होगा। 
--जिसके लिए हमें मीणा समाज के बीच गाँव गाँव लोगों के बीच जाकर बात करनी होगी। 
--केवल रैली और भीड़ जुटाने से कुछ नहीं होगा, समाज को सच बताना और समझना होगा।
--अब जरा सा भी विलम्ब घातक होगा। पलों के विलम्ब की कीमत हजारों सालों तक चुकानी होगी। 
--अत : मित्रो तुरंत--"जागो, जगाओ, सच बताओ और अपना सामाजिक दायित्व निभाओ!"
-----डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' प्रमुख-हक रक्षक दल (98750-66111)

6.11.14

मीणा मीना (Meena Mina) विवाद और माधुरी पाटिल केस की अन्यायपूर्ण सिफारिशों से कैसे निपटें?

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' प्रमुख-हक रक्षक दल (अनार्यों के हक की आवाज)

राजस्थान सरकार ने 30 सितमबर, 2014 के अपने लिखित आदेश को यथावत रखते हुए कथित रूप से मीडिया को केवल इतना सा नया कहा है या संकेत दिया है कि-मीणा (Meena) को मीना (Mina) जाति के नाम से जाति प्रमाण पत्र बनाने पर सरकार ने कोई रोक नहीं लगायी है! यह साफ़ तौर पर हमें मूर्ख बनाने का मनुवादी तरीका है! अभी भी हमारे सामने निम्न जटिल और भयावह प्रश्न ज्यों के त्यों खड़े हुए हैं।
जिन्हें दो भागों में विभाजित करके समझना होगा -

पहला : जो मनुवादियों की साजिश का नतीजा है :-
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  • 1-जिन मीणाओं के मीणा (Meena) जाति के नाम से पहले से जाति प्रमाण पत्र बने हुए हैं और जो राजस्थान सरकार के अधीन सेवारत हैं, सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है कि उनके जनजाति होने पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं किया जायेगा? क्योंकि ऐसे मामलों पर समता आन्दोलन समिति ने लिखित में सरकार के समक्ष सवाल उठाना शरू कर दिया है? और सरकार ऎसी शिकायतों पर वाकायदा विधिक कार्यवाही करावा रही है। 
  • 2-जिन मीणाओं के मीणा (Meena) जनजाति के नाम से पहले से जाति प्रमाण पत्र बने हुए हैं और जो केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य या किसी अर्द्ध शासकीय निकाय के अधीन सेवारत हैं, राजस्थान सरकार का उक्त कथित आदेश/बयान ऐसे लोगों को कोई वैधानिक संरक्षण नहीं दे सकता! क्योंकि यह राजस्थान सरकार की संवैधानिक अधिकारिता से बाहर का मामला है! ऐसे मामलों पर भी समता आन्दोलन समिति ने सवाल उठाना शरू कर दिया है?
  • 3-मुझे (दिनाक : 05.10.14) को मोबाईल पर अपने ही एक भाई ने बताया कि वह एक अर्द्ध शासकीय निकाय में कार्यरत है। उसके मीणा (Meena) जनजाति के जाति प्रमाण पत्र के खिलाफ लिखित में शिकायत की जा चुकी है! और उसे फर्जी जनजाति बताकर नौकरी से निकालने तथा उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की मांग की गयी है! इस कारण हमारा ये भाई अत्यधिक तनाव के दौर से गुजर रहा है! ऐसे में क्या सरकार का कथित बयान कोई मदद कर सकेगा?
  • 4-यदि समता आन्दोलन समिति राज्य सरकार के कथित आदेशों/बयानों को न्यायिक अवमानना बतलाकर हाई कोर्ट में चुनौती देती है तो (और मेरा स्पष्ट मत है कि चुनौती देगी ही) सरकार के ऐसे कथित आदेश/बयान  कहीं नहीं टिकेंगे, क्योंकि सरकार के ये कथित आदेश/बयान असंगत, अनौचित्यपूर्ण, अ-युक्तियुक और कानून की दृष्टी में विधि विरुद्ध हैं! जिनके पीछे कोई संवैधानिक अधिकारिता राज्य सरकार के पास नहीं है! 
  • 5-एक मामले में सुप्रीम कोर्ट का साफ़ कहना है कि-Article 366(25) defines Scheduled Tribes, as meaning such tribes or tribal communities or parts of or groups within such tribes or tribal communities as are declared under Article 342 to be Scheduled Tribes for the purposes of the Constitution. Article 342 gives power to the President to specify the tribe with respect to any State or Union Territory, after consultation with the Governor where it is a State, by public notification, specify the tribes or tribal communities or parts of or groups within tribes or tribal communities which shall, for the purposes of the Constitution, be deemed to be Scheduled Tribes in relation to that State or Union Territory, as the case may be.

दूसरा जो मनुवादियों की न्यायिक साजिश को खुद हमारे द्वारा ही गले की हड्डी बनाने का नतीजा है :-
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उक्त सब के साथ-साथ माधुरी पाटिल केस की अन्यायपूर्ण, उत्पीड़क और मनमानी सिफारिशें, जो कि समस्त आरक्षित वर्गों को जीवन भर और कदम कदम पर अपमानित करने वाली हैं। जिनको लागू करवाने की कार्यवाही हमारे ही कुछ विद्वान् भाइयों द्वारा की गयी है! ये सिफारिशें यदि ज्यों की त्यों लागू कर दी गयी तो हमें अनेक प्रकार की ऐसी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है, जिनकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती है! माधुरी पाटिल केस की अन्यायपूर्ण सिफारिशें हमें निम्न संभावित मुसीबतों का सामना करने को मजबूर कर सकती हैं :-

  • (1) यदि वर्तमान मीणाओं का मूल आदिवासी मीणा संस्कृति से मेल नहीं तो जनजाति प्रमाण पत्र नहीं बनाया जाये!
  • (2) बेशक किसी आवेदक कि जाति का नाम मीना (Mina) है, मगर यदि पुराने रिकोर्ड में उसके समर्थन में मीना आदिवासी संस्कृति, प्रथा और परम्परा सिद्ध नहीं होती तो ऐसे आवेदक को गैर आदिवासी ठहराने का जांच कमिटी को कानूनी हक होगा!
  • (3) जाँच कमिटी उनके खिलाफ भी बिठायी जा सकती है, जिनके पूर्व से ही मीना (Mina) नाम से जनजाति के प्रमाण पत्र बने हुए हैं! और उनके बारे में जाँच की जा सकती है कि उनकी मीना आदिवासी संस्कृति, प्रथा और परम्परा सिद्ध होती है या नहीं!
  • (4) जांच कमिटियों में जमकर मनमानी भ्रष्टाचार होगा, जिसे रोकना असंभव होगा! 
  • (5) जाँच कमिटी गलत जांच करके, गलत निष्कर्ष निकाल कर, असंगत, मनमानी और अवैधानिक रिपोर्ट दे सकेगी! जिसे रोकने के लिए मनुवादी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाने का आलावा कोई वैधानिक विकल्प इस निर्णय में नहीं! 
  • (6) जनजाति का प्रमाण पत्र उच्च स्तर पर बनेगा! जिसका सीधा अर्थ है कि उच्च स्तर की मुसीबत! एक तहसीलदार के दफ्तर में प्रवेश करना और उप कलेक्टर/कलेक्टर के दफ्तर में प्रवेश करना आम जनजाति के लोगों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत का सबब होगा! 
  • (7) यदि एक लाइन में कहा जाये तो माधुरी पाटिल केस की एक पक्षीय सिफारिशें लागू होते ही सभी आरक्षित श्रेणी के लोग (ST/SC/OBC/SBC/MBC) सरकार की नजर में अविश्वसनीय होंगे, जिन्हें खुद यह सिद्ध करना होगा कि उन पर विश्वास किया जाये वे वास्तव में आरक्षित वर्ग से ही हैं! जो न्याय शास्त्र के मौलिक सिद्धांत के खिलाफ है-जिसमें साफ़ कहा गया है कि किसी व्यक्ति को ये नहीं कहा जा सकता कि वो खुद को निर्दोष सिद्ध करे! दोषी सिद्ध करने का भार आरोप लगाने वाले पर होता है! जबकि माधुरी पाटिल केस की एक पक्षीय सिफारिशों ने तो पूरी की पूरी कॉम को ही आरोपियों की भांति कटघरे  खड़ा कर दिया है।  
  • (8) दूसरे शब्दों में माधुरी पाटिल केस की एक पक्षीय सिफारिशें लागू होते ही आरक्षित वर्गों कि पोजीशन जरायम पेशा एक्ट में शामिल जातियों की जैसी हो सकती है! जिन्हें पुलिस और कानून के सामने नाचना पड़ता था! अब आरक्षित वर्गों को जाँच कमेटी के सामने नाचना और गिडगिडाना पड़ सकता है!
  • नोट : इसके आलावा भी बहुत सारे अन्य दुष्परिणाम आमने आ सकते हैं.

मीणा मीना (Meena Mina) विवाद के समाधान : जो हक रक्षक दल द्वारा सुझाये जा रहे हैं और जिन पर हक रक्षक दल के लाखों समर्थक और सक्रिय रक्षक दिन रात काम कर रहे हैं:-
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1-मीणा मीना : राजस्थान सरकार को इस बात के लिए सहमत या मजबूर किया जाये कि वह केंद्र सरकार को तुरंत निम्न सिफारिश भेजे :
राजस्थान की जनजातियों की सूची में क्रम 9 पर दर्ज मीना/Mina जनजाति  के साथ/स्थान पर मीणा जाती के सभी पर्यायवाची नाम मीणा, मीना, मैना, मैणा, मैंणा, मैंना, मेना, मेणा लिख कर मूल अधिसूचना को संशोधित कर जारी की जाये।
2-मीणा मीना विवाद क्या है, इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं और इसका समाधान क्या है? इन सवालों के सही जवाब आम मीणाओं को ज्ञात नहीं हैं। इस बारे में गलत, अधूरी और निराधार जानकारी देने से लोग भ्रमित होते हैं।  अत: ऐसी जानकारी देने के बजाय कुछ न बताया जाना बेहतर हैं।

3-पैनल बनाया जावे : समाज के प्रबुद्ध गैर राजनैतिक लोगों को अपने-अपने अहंकार या निहित स्वार्थों को त्यागकर अविलम्ब आपस में बैठकर मीणा मीना मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए और वर्तमान में ईमानदारी से सक्रिय सभी लोगों में से एक मजबूत पैनल बनाया जावे जो मीणा मीना मुद्दे पर संघर्ष की नीति का निर्धारण करे। हक रक्षक दल इसमें हर तरह से सहयोग करने को तत्पर है। हक रक्षक दल ऐसा पैनल बनाने पर काम करना शुरू कर चुका है। 

4-शांतिपूर्ण और अनुशासित जन आंदोलन : उक्त पैनल, उक्त बिंदु एक में प्रस्तावित संशोधित अधिसूचना को जारी करवाने के लिए राजस्थान सरकार को कैसे सहमत/मजबूर करें, इसके लिए रणनीति तय करे। हक रक्षक दल की राय में इसका  एक मात्र रास्ता है :
---------------------------"शांतिपूर्ण और अनुशासित जन आंदोलन।"------------------

5-व्यक्तिगत आक्षेप लगाने से बचना होगा : हम मीणाओं को सोशल मीडिया पर और सार्वजनिक मंचों पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने से बचना होगा और आपस में सहयोग बढाकर एकता कायम करनी होगी। जो नासमझ या अपरिपक्व या भ्रमित मीणा इसमें बाधक हों, उनको समझकर कैसे साथ लिया जाये, इस बारे में भी मिलकर तुरंत सकारात्मक निर्णय लेना जरूरी है। 
  
6-गैर-मीणा आदिवासी जनजातियों से संवाद कायम किया जावे : राजस्थान की सभी गैर-मीणा आदिवासी जनजातियों को मनुवादियों की साजिशों के बारे में को अविलम्ब समझाया जाना बहुत जरूरी है। उनके साथ किसी भी तरीके से प्रेमपूर्ण और सम्मानजनक संवाद कायम किया जावे। क्योंकि संवादहीनता हमेशा दूरियां बढ़ाती है।
  
7-दलितों का सहयोग : हम मीणाओं को दलितों के प्रति सम्मानजनक, सहयोगात्मक और बराबरी के रिश्ते कायम करने ही होंगे। जिससे एक दूसरे की मुसीबतों में मिलकर संघर्ष किया जा सके। हक रक्षक दल इस मुहिम को पहले से ही आगे बढ़ा चुका है।

8-ओ बी सी का सहयोग : समस्त आरक्षित वर्गों को एकजुट हो करके ताकत दिखने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग को भी साथ में लिया जाना समय की मांग है। हक रक्षक दल इस मुहिम को पहले से ही आगे बढ़ा चुका है।
         
माधुरी पाटिल केस की सिफारिशों  के बारे में विचार :
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मेरी व्यक्तिगत रूप से स्पष्ट राय है (हक रक्षक दल के सभी जागरूक रक्षक साथ हैं) कि-

1-आरक्षित वर्गों की और से माधुरी पाटिल केस की अन्यायपूर्ण सिफारिशों को निरस्त करवाने के लिए संवैधानिक कार्यवाही होनी चाहिए! यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि पूर्व में दर्जनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने खुद के ही निर्णयों को ये कहते हुई पलटा है कि पिछला निर्णय उचित नहीं था या पिछ्ला निर्णय संकीर्ण न्यायिक व्याख्या पर आधारित था। इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण है : मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए आई आर, 1978. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही कई पिछले निर्णयों को पलटा था।  

2-यह कोनसा न्याय है कि सुप्रीम कोर्ट देश की पिच्यासी फीसदी आरक्षित आबादी की अस्मिता और सत्यनिष्ठा की जांच/परीक्षण करने का आदेश उन कुछ अपराधियों को रोकने के लिए दे रहा है जो असत्य जानकारी देकर आरक्षित वर्गों के जाति प्रमाण पत्र बनवाने वाले, यह नजरिया आरक्षित वर्गों के प्रति अन्यायपूर्ण और मनमानी मनुवादी प्रक्रिया है। जो अविलम्ब रोकी जावे।

3-यदि न्यायपालिका आरक्षित वर्गों के संरक्षण हेतु वास्तव में न्यायपूर्ण और निष्पक्ष निर्णय करने में सक्षम है तो और गलत जाति प्रमाण पत्र जारी बनवाने वाले अपराधियों और जाति प्रमाण पत्र बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ वाजिब और तथ्यपूर्ण शिकायत मिलने के बाद (उनको कड़ी सजा दिलवाना चाहती है तो) शिकायत की निष्पक्ष जाँच की जाये और दोषियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक कार्यवाही करके कम से कम दस साल के कठोर कारावास की सजा का प्रावधान किया जाए! अपने आप ही गलत जाति प्रमाण पत्र बनना बंद हो जाएंगे। 

4-यह तो कोई न्याय नहीं हुआ कि कुछ मनुवादी या अपराधी लोग या अनारक्षित या दूसरे वर्गों की जातियां अपने आप को आरक्षित घोषित करके और अफसरों से मिलकर आरक्षित वर्गों के जाति प्रमाण पत्र जारी करावा सकती या करवा रही हैं, इसलिए ऐसे अपराधियों को दण्डित करने करने के बजाय समस्त आरक्षित वर्गों को संदेह ही नजर से देखा जाये और सभी का अपराधियों की भांति परीक्षण किया जाये। जिसमें उनकी मूल संस्कृति, प्रथा, परम्परा, रिवाज और जीवन शैली का परीक्षण भी शामिल किया जाये। ऐसा तो आतंकवादियों/अपराधियों के साथ भी नहीं किया जाता है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध है।  

5-जबकि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को जानने वाले जानते हैं की मनुष्य का समाजीकरण जिन हालातों में होता है, उसका उसके जीवन और आचरण पर गहरा प्रभाव होता है! जिससे मूल संस्कृति, प्रथा, परम्परा, रिवाज और जीवन शैली आदि सभी में बदलाव आते हैं।

आशा है कि सभी प्रबुद्धजन, इस अत्यंत गम्भीर और चिंतनीय विषय पर गंभीरता से चिंतन कर के समाज को मुसीबतों से बाहर निकलने के लिए अपने रचनात्मक विचार और सुझाव प्रस्तुत करेंगे।
------------------------डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' प्रमुख-हक रक्षक दल (अनार्यों के हक की आवाज)

30.10.14

मीणा-मीना विवाद कोर्ट में लड़ना आत्मघाती!

=========29 अक्टूबर के हाई कोर्ट के आदेश के संदर्भ में========= 
==========मीणा-मीना विवाद कोर्ट में लड़ना आत्मघाती!========
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मीणा समाज के दूरगामी हित में आज मैं इस बात को स्पष्ट करना जरूरी समझ रहा हूँ कि हाई कोर्ट के जरिये बाहरी और भीतरी मनुवादी हमारे आरक्षण को समाप्त करवा चुके हैं और बचे खुचे को भी बर्बाद करने पर तुले हुए हैं।

सोशल मीडिया के मार्फ़त मिलने वाली जानकारियों से ऐसा लगता है कि अधिकतर मीणाओं का ये मानना है कि-

-श्री जी एस सोमावत जी के नेतृत्व में मीणा-मीना (Meena-Mina) मुद्दे को मीणाओं की ओर से कोर्ट में लड़ा जा रहा है।

-इस कारण श्री सोमावत जी की ओर से और अन्य अनेक लोगों की ओर से आर्थिक सहयोग करने की अपील भी पढने को मिलती रही हैं।

-अनेक लोगों ने बढ़ चढकर आर्थिक सहयोग भी किया है।

जबकि सच ये है कि मीणाओं की ओर हाई कोर्ट में मीणा-मीना (Meena-Mina) मुद्दे पर कोई भी नहीं लड़ रहा है, बल्कि श्री सोमावत जी कोर्ट के समक्ष खुद के संगठन को सम्पूर्ण मीणा समाज का एक मात्र अधिकृत प्रतिनिधि घोषित करके, हाई कोर्ट को मीणाओं की ओर से समानता मंच के आरोपों जवाब और सफाई देते रहे रहे हैं। साथ ही उनकी और से कुछ याचिकाएं भी दायर की गयी हैं।

कुल मिलाकर कोर्ट में श्री सोमावत जी ने जो कुछ भी तथाकथित संघर्ष किया है, उसकी अभी तक की निम्न महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं:-

पहली उपलब्धि : हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि मीणा (Meena) जाति आदिवासी नहीं हैं।
------------जिसके अनुपालन में राजस्थान सरकार ने 30 सितंबर को आदेश जारी किया। मीणा (Meena) जाति का आरक्षण समाप्त किया जा चुका है। मीना (Mina) जाति के नाम से भी जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहे हैं।

दूसरी उपलब्धि : 29 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने जो दिशानिर्देश दिए हैं, बल्कि सच तो ये है कि श्री सोमावत जी ने जो दिशानिर्देश हाई कोर्ट से मांगे हैं या हाई कोर्ट से दिलवाए हैं, उनके लागू हो जाने के बाद मीणाओं के जाति प्रमाण पत्र बनना शतप्रतिशत बंद हो जाने वाले हैं। 

आपको पता है कि श्री सोमावत जी की टीम की ओर से हाई कोर्ट से क्या दिशा निर्देश मांगे गए?
==जानिये : श्री जी एस सोमावत जी की टीम ने रिट दायर करके हाई कोर्ट से लिखित में और मौखिक रूप से निवेदन किया कि हाई कोर्ट राज्य सरकार को निर्देश दे कि----जाति प्रमाण पत्र तहसीलदार के बजाय उप जिला कलेक्टर (SDM) द्वारा बनाये जावें और उप जिला कलेक्टर द्वारा भी आवेदक की बिना सम्पूर्ण जांच पड़ताल के और आवेदक का चालीस-पचास साल का रिकॉर्ड वैरीफाई किये बिना जाति प्रमाण पत्र नहीं बनाये जावें। हाई कोर्ट ने इस याचिका को मंजूर करके राज्य सरकार को निर्देश जारी किये हैं। जिसको मीणाओं की जीत बताकर कुछ लोग खुशियां मना रहे हैं। इससे पता चलता है कि हम कितने समझदार हैं?
नोट : आज जबकि हम सब अच्छी तरह से जान चुके हैं कि आजादी के बाद से मनुवादियों द्वारा मीणा जाति के रिकॉर्ड में हर स्तर पर लगातार छेड़छाड़ की जाती रही है। कहीं मीणा (Meena) तो कहीं मीना (Mina) ऐसे में मीणाओं का रिकॉर्ड कैसे वैरीफाई होगा? और कैसे जाति प्रमाण पत्र बनेंगे? विशेषकर तब जबकि सामान्य हालातों में ही नहीं बनाये जा रहे हैं? यदि चालीस-पचास साल का रिकॉर्ड वैरीफाई किया जाना अनिवार्य हुआ तो तो यही एक बहाना काफी होगा उप जिला कलेक्टर के लिए। वो महिनों तक टाल सकेगा। तहसीलदार तक तो आसानी से पहुंचा भी जा सकता था। अब उप जिला कलेक्टर के पास पावर होगी!

इन हालातों में, मैं एक बार फिर से सोशल मीडिया के मार्फत सभी मीणाओं को आगाह करना मैं अपना सामाजिक फर्ज समझता हूँ कि-

1-पहले दिन से व्यक्तिगत रूप से मेरा स्पष्ट मत रहा है कि हम कोर्ट में खड़े होकर मीणाओं का नुकसान कर रहे हैं।

2-इस बात को मैं श्री सोमावत जी को भी एक से अधिक बार बता चुका हूँ। वे खुद भी मानते हैं कि जीतना सम्भव नहीं है। इसीलिए मैंने लिखा था कि कोर्ट की लड़ाई हारने के लिए लड़ी जा रही है।  

3-कुछ मित्रों ने मेरी इस बात का मजाक उड़ाया और कुछ ने खुलकर मेरी बुराई की।

4-जब हाई कोर्ट ने मीणा जाति का आरक्षण समाप्त कर दिया, तब कुछ लोगों को समझ में आया था। फिर भी कोर्ट में लड़ने का नाटक आज तक क्यों जारी रहा है? 

चेतावनी : अभी भी समय है कि हम अपनी नीति में बदलाव लाएं। बाहरी और भीतरी मनुवादियों को पहचानें। कोर्ट में लड़ना आत्मघाती कदम है। इससे अधिक संकेत सार्वजनिक रूप से देना सम्भव नहीं है। फिर से दोहरा दूँ कि-बाहरी और भीतरी मनुवादियों को पहचानें।

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-98750-66111

28.10.14

मीणा-मीना मुद्दा समाधान हेतु सार्वजनिक अपील

मीणा-मीना मुद्दा समाधान हेतु सार्वजनिक अपील

अगस्त, 2014 के प्रारम्भ तक अधिकतर मीणा राजनेताओं और क्लास वन अफसरों की नजरों में मीणा-मीना (Meena-Mina) मुद्दा चर्चा करने लायक तक नहीं था। आम मीणाओं को इस मुद्दे के बारे में कुछ पता ही नहीं था। 18 अगस्त, 14 को हक रक्षक दल का जन्म हुआ। जिसके रक्षकों ने दिन-रात एक करके प्रिटं एवं सोशल मीडिया सहित गॉंव-गॉंव में हस्ताक्षर अभियान के जरिये जागरण अभियान चलाया और तस्वीर बदल दी। हक रक्षक दल ने सरकार, समाज और मीडिया के सामने तथ्यपरक जानकारी पेश कर दी कि मीणा-मीना मुद्दे के जन्मदाता मनुवादी, पूंजीपति और काले अंग्रेज हैं। जिन्होंने न्यायपालिका के मार्फत मीणा जाति के आरक्षण को समाप्त करने का षड़यंत्र रचा, जिसमें वे सफल हो चुके हैं। 30 सितम्बर को आदेश जारी करके सरकार ने मीणा (Meena) जाति का आरक्षण समाप्त कर दिया। दोनों प्रमुख दल भी इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं। दुष्परिणाम यह हुआ कि आज अधिकतर तहसीलदार मीना (Mina) जाति का जाति प्रमाण-पत्र भी नहीं बन रहे हैं। नौकरी और उच्च शिक्षा की आस लगाये बैठी युवा मीणा प्रतिभाएँ परेशान, निराश, हताश और आक्रोशित हैं।

1950 से अभी तक का अनुभव प्रमाणित करता है कि न्यायपालिका ने हमेशा ही आरक्षण को कमजोर किया है। अत: इस मुद्दे का कोर्ट के जरिये समाधान मुश्किल है। ऐसे में गोत्र, क्षेत्र और राजनैतिक भेद को भुलाकर सभी मीणाओं को एकजुट होकर षड़यंत्रकारी मनुवादियों और सरकार की मनमानी के खिलाफ एक जुट होना होगा। जिससे मीणा और मीना (Meena & Mina) नाम से संशोधित अधिसूचना जारी करने के लिये सरकार को मजबूर किया जा सके। मगर अधिकतर सामाजिक कार्यकर्ता, मीणा राजनेता और उच्च अधिकारी मनुवादियों और सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने तक को तैयार नहींं। हक रक्षक दल का भी विरोध किया जा रहा है। जिसके निम्न कारण हैं :-

1. अधिकतर वर्तमान/पूर्व मीणा सांसदों, विधायकों और राजनेताओं का मानना है कि मीणा-मीना मुद्दे के षड़यंत्रकारी मनुवादियों तथा दोनों बडे़ दलों की कुनीतियों का विरोध करने के बाद उनका मनुवादी वोट बैंक और राजनैतिक भविष्य समाप्त हो सकता है। इसलिये वे चुप हैं।

2. अनेक प्रभावशाली उच्चाधिकारी और समाज सेवक भी सांसद-विधायक बनने के सपने देखते रहते हैं। इसलिये उन्हें भी यही डर है कि मनुवादियों का विरोध करने के बाद किसी भी बड़े दल का टिकिट और वोट नहीं मिलने वाला ऐसे में वे भी खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं।

3. हक रक्षक दल मीणा-मीना मुद्दे सहित सभी आरक्षित वर्गों के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष कर रहा है। इस कारण हक रक्षक दल के बढते प्रभाव और बढती लोकप्रियता से राजनेताओं सहित भावी सांसदों और भावी विधायकों की जमीन खिसक रही है। अत: सब मिलकर हक रक्षक दल का विरोध करने और इसे कमजोर करने में जुट गये हैं। हक रक्षक दल के कार्यकर्ताओं को धमकियॉं तक दी जा रही हैं।

अत: मीणा-मीना मुद्दे का संवैधानिक समाधान चाहने वाले सभी लोगों से निवेदन है कि या तो सभी गैर-राजनैतिक लोगों को संयुक्त संघर्ष करने के लिये तैयार करें। हक रक्षक दल साथ देगा। अन्यथा हक रक्षक दल को खुलकर सहयोग, समर्थन और संरक्षण प्रदान करें।

--डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’, प्रमुख-हक रक्षक दल (अनार्यों के हक की आवाज) और हक रक्षक दल के समस्त रक्षकगण।-28.10.2014 (9875066111)--

21.10.14

क्या अभी भी मीणाओं को सोते रहना चाहिए?

क्या अभी भी मीणाओं को सोते रहना चाहिए?
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-मीणा (Meena) जाति के प्रमाण पत्र धारी मीणाओं का नौकरियों में चयन निरस्त करना शुरू किया जा चुका है। जाति प्रमाण पत्र banae नहीं जा रहे हैं। और
-नौकरी कर रहे जिन मीणा लोगों के जाति प्रमाण पत्र "मीणा" (मीणा/Meena) नाम से बने हैं, उनको नौकरी से बर्खास्त करने के लिए मनुवादी ताकतें लगातार राज्य और केंद्र सरकार पर दबाव डाल रही हैं और सरकारी खुफिया सूत्रों के अनुसार अंदरखाने इस मुद्दे पर मीणाओं के खिलाफ निर्णय लिए जाने का षड्यंत्र शुरू हो चुका है।
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आज सम्पूर्ण मीणा जाति पर मनुवादी षड्यंत्रों की मार पड़ी है।
जिन लोगों ने हजारों सालों तक हमें अपने पैरों के नीचे रखा और फिर भी हमारे पूर्वज उनके पैर पूजते रहे हैं।
आज वही लोग सम्पूर्ण मीणा समाज की गर्दन काटने को तत्पर हैं।
मीणाओं की आरक्षण आधारित सांकेतिक उन्नति से जलने वालों ने हमें
मीणा (Meena) और मीना (Mina) दो जातियों में बांटने का षड्यंत्र रच डाला।
करीब दस वर्ष से यह मामला कागजों में चल रहा था।
मगर मीणाओं में राजनैतिक नेतृत्व ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
जबकि केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद में भी मीणाओं की हिस्सेदारी थी।

"हक रक्षक दल" का गठन सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए किया गया है।
और आरक्षण का मूल मकसद सामाजिक न्याय की स्थापना करना है।
"हक रक्षक दल" की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर "मीणा-मीना" मुद्दा है।

2004 से अगस्त, 2014 तक राजनैतिक और प्रशासनिक पदों पर बैठे मीणाओं ने "मीणा मीना" मुद्दे को मुद्दा ही नहीं माना।
ऐसे हालातों में "हक रक्षक दल" ने षड्यंत्रकारी लोगों के खिलाफ खड़े होने का निर्णय लिया और "मीणा-मीना" एक जाति है, इसके समर्थन में गाँव-गाँव में जाकर एक लाख लोगों के हस्ताक्षर करवाने का अभियान शुरू किया।
सोशल मीडिया पर भी अभियान चलाया गया।
जिससे लोगों को इस मुद्दे की गंभीरता का ज्ञान हुआ।
कुछ मीणा जन प्रतिनिधियों और अफसरों ने इस अभियान का भी विरोध किया। आज भी विरोध जारी है। इन लोगों ने "हक रक्षक दल" को तथा इसके कार्यकर्ताओं को बदनाम करने हेतु अनेक प्रकार से दुष्प्रचार भी किया।
मगर "हक रक्षक दल" की मुहिम लगातार बढ़ती ही जा रही रही है।
"हक रक्षक दल" की और से मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया गया और मुद्दे की हकीकत सरकार, समाज और मीडिया के सामने प्रस्तुत की गयी।

इस सबका असर यह हुआ कि आज अज्ञानी मीणा समाज जाग रहा है।
इस प्रकार "हक रक्षक दल" के अभियान का प्राथमिक चरण-समाज को नींद से जगाने और मीणा मीना मुद्दे की हकीकत उजागर करने का कार्य पूर्ण हो चुका है।

हमारे कुछ लोग हाई कोर्ट में भी मुकदमें लड़ रहे हैं।
जबकि "हक रक्षक दल" का पहले दिन से कहना रहा है कि कोर्ट से हम नहीं जीत सकते, क्योंकि -
0-------कोर्ट में मनुवादियों का वर्चस्व है। जहाँ हमें ठीक से सुना तक नहीं जाता।
0-------इतिहास गवाह है की न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) ने आरक्षण को हमेशा कमजोर ही किया है।
0-------दुष्परिणाम सबके सामने है-वरिष्ठता, पदोन्नति आदि से खुली छेड़छाड़ की गयी।
0-------यदि हाई कोर्ट बिना मुकदमें का अंतिम निर्णय सुनाये ही मीणा (Meena) जाति को जनजाति सूची में से बाहर कर दे तो इसे क्या कहा जाए? न्याय के नाम पर ये मजाक नहीं है?
0-------जिसके चलते राज्य सरकार ने मीणा (Meena) जाति के लोगों को जाति प्रमाण पत्र बनाने पर रोक लगा दी है।
0-------जिसकी आड़ में तहसीलदार "मीना" (Mina) नाम से भी जाति प्रमाण पत्र नहीं बना रहे हैं।
0-------मीणा (मीणा/Meena) जाति के प्रमाण पत्र धारी मीणाओं का नौकरियों में चयन निरस्त करना शुरू किया जा चुका है।
0-------नौकरी कर रहे जिन मीणा लोगों के जाति प्रमाण पत्र "मीणा" (मीणा/Meena) नाम से बने हुए हैं, उनको नौकरी से निकलवाने के लिए मनुवादी ताकतें लगातार राज्य और केंद्र सरकार पर दबाव डाल रही हैं और सरकार के खुफिया सूत्रों के अनुसार अंदरखाने इस मुद्दे पर मीणाओं के खिलाफ निर्णय लिए जाने का षड्यंत्र शुरू हो ही चुका है।
0-------फिर भी कोर्ट की चोखट पर माथा टेकने का हमारे लोगों का भोलापन अभी तक जारी है।

अब केवल एक ही उपाय है-गैर राजनैतिक जन आंदोलन, क्योंकि लोकतंत्र में जनता की एकजुट ताकत के सामने झुकना सत्ता की मजबूरी होती है।

अत: हमें याद रखना होगा कि-

1========एक साथ आना शुरूआत है।
2========एक साथ रहना प्रगति है। और
3========एक साथ काम करना सफलता है।

आगे की लड़ाई हम सबको सामूहिक रूप से लड़नी होगी।
आज हम मीणा जिन हालातों में पहुंचा दिए गए हैं, ऐसे में हमें क्षेत्र, गोत्र आदि को भूलकर समाज हिट में एकजुट होकर ईमानदारी से संघर्ष/योगदान करना होगा।

ऐसे विकट हालातों में हमारे लिए सारे मनमुटाव भुलाकर तुरंत एक होने का समय है।
हमें मीणाओं के आलावा दूसरे समुदायों और वर्गों का सहयोग मिल सके लेना चाहिए।
--- डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' प्रमुख-हक रक्षक दल (अनार्यों के हक की आवाज)

13.10.14

समाज सेवकों के वेश में भावी मनुवादी जन प्रतिनिधि तैयार हो रहे हैं?

समाज सेवकों के वेश में भावी मनुवादी जन प्रतिनिधि तैयार हो रहे हैं?
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

राजस्थान सरकार की पूर्ववर्ती कांग्रेसी और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार के प्राश्रय से राजस्थान में 'मीणा' जनजाति को आरक्षित वर्ग में से बाहर निकालने के दुराशय से एक सुनियोजित षड़यंत्र चल रहा है। जिसके तहत 'मीणा' जनजाति के बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है की 'मीणा' और 'मीना' दो भिन्न जातियां हैं। 'मीना' को जनजाति और 'मीणा' को सामान्य जाति बताया जा रहा है। जिसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि शुरू में जारी अधिसूचना में एक सरकारी बाबू ने 'मीणा' जाती को अंग्रेजी में Mina लिख दिया। जिसे बाद में हिन्दी अनुवादक ने ‘मीना’ लिख दिया। इसके बाद से सरकारी बाबू सरकारी रिकार्ड में मीणा जनजाति को समानार्थी और पर्याय के रूप में (Meena/Mina) (मीणा/मीना) लिखते आये हैं। राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारियों द्वारा 'मीणा' और 'मीना' दोनों नामों से जनजाति के जाति प्रमाण पत्र भी 'मीणा' जाति के लोगों को शुरू से जारी किये जाते रहे हैं। अनेक ऐसे भी उदाहरण देखने को मिल रहे हैं, जहॉं पर एक ही परिवार में बेटा का 'मीणा' और बाप का 'मीना' नाम से जनजाति प्रमाण पात्र जारी किये हुआ है।


इसके उपरांत भी मनुवादियों, पूंजीपतियों और काले अंग्रेजों द्वारा आरक्षित वर्गों के विरुद्ध संचालित 'समानता मंच' के कागजी विरोध को आधार बनाकर और समानता मंच द्वारा किये जा रहे न्यायिक दुरूपयोग के चलते मनुवादी राजस्थान सरकार ने आदेश जारी कर दिये हैं कि यद्यपि अभी तक 'मीणा' और 'मीना' दोनों नामों से 'मीणा' जाति को जनजाति प्रमाण-पत्र जारी किये जाते रहे हैं, लेकिन भविष्य में सक्षम प्राधिकारी  ‘मीणा’ जाति को जनजाति के प्रमाण पत्र जारी नहीं करें और जिनको पूर्व में 'मीणा' जन जाति के प्रमाण-पत्र जारी किये गये हैं, उनके भी 'मीना' नाम से जनजाति प्रमाण-पत्र जारी नहीं किये जावें। आदेशें में यह भी कहा गया है कि इन आदेशों को उल्लंघन करने पर अनुशासनिक कार्यवाही की जायेगी।

यहॉं स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी उठता है कि यदि ‘मीना’ जाति ही जनजाति है तो 'मीना' जाति के लोगों को 'मीणा जनजाति' के प्रमाण-पत्र जारी करने वाले प्राधिकारियों के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा कोई अनुशासनिक कार्यवाही किये बिना इस प्रकार के आदेश कैसे जारी किये जा सकते हैं? विशेषकर तब जबकि 'मीणा' जनजाति के नाम से सरकार की ओर से जारी किये गये जन के जाति प्रमाण-पत्रों के आधार पर हजारों की संख्या में 'मीणा' जनजाति के कर्मचारी और अधिकारी सेवारत हैं। यही नहीं जब पहली बार मीणा जनजाति को जनजातियों की सूची में शामिल किया गया था तो काका कालेकर कमेटी ने अपनी अनुशंसा में हिन्दी में साफ़ तौर पर 'मीणा' लिखा था।

उपरोक्त सरासर किये जा रहे अन्याय और मनमानी के खिलाफ जयपुर में मीणा जाति की और से 12 अक्टूबर, 2014 को सांकेतिक धरने का आयोजन किया गया। जहॉं पर एक बात देखने को मिली कि मीणा समाज के लोग अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ तो खुलकर बोले, लेकिन राजनैतिक बातें करने से कतराते दिखे।

इस बारे में मेरा यह मानना और कहना है कि यह सर्व विदित है की आज के समय में कहने को तो देश संविधान द्वारा संचालित हो रहा है, मगर सच तो ये है कि सब कुछ, बल्कि सारी की सारी व्यवस्था ही राजनीति और ब्यूरोक्रेसी के शिकंजे में है, राजनेता तथा ब्यूरोक्रेट्स राजनैतिक पार्टियों के कब्जे में हैं। राजनैतिक पार्टियों पर मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों का सम्पूर्ण कब्जा है। मतलब साफ़ है कि सारे देश पर संविधान का नहीं मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों का कब्जा है। जब तक देश मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त नहीं होगा, देश का हर व्यक्ति मनुवादियों, पूंजिपतियों और काले अंग्रेजों द्वारा संचालित मनमानी व्यवस्था का गुलाम ही बना रहेगा। 

इस सबके उपरान्त भी 'मीणा' जाति ही नहीं, अकसर सभी समाजों के मंचों पर चिल्ला-चिल्ला कर घोषणा करवाई जाती हैं कि यहां राजनीति के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाएगी। केवल इस डर से कि राजनीति की चर्चा करने से ऐसा नहीं हो कि 'मीणा' समाज के राजनेताओं का समर्थन मिलने में किसी प्रकार की दिक्कत पैदा नहीं हो जाये। इसके विपरीत इस बात को भी सभी जानते हैं कि राजनेता अपनी-अपनी पार्टी की जी हुजूरी पहले करते हैं। इसके बाद देश, समाज या अपनी जाति के बारे में सोचते हैं। फिर भी राजनीति के बारे में चर्चा क्यों नहीं होनी ही चाहिए? इस बात का कोई जवाब नहीं दिया जाता है।

ऐसी सोच रखने वालों से मेरा सीधा सवाल है कि राजनीति कोई आपराधिक या घृणित या असंवैधानिक या प्रतिबंधित शब्द तो है नहीं? राजनीति हमारे यहॉं संवैधानिक अवधारणा है। जिससे संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र संचालित हो रहा है। ऐसे में राजनेताओं और राजनीति दोनों की अच्छाइयों और बुराइयों पर खुलकर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि चर्चा पर ही पाबंदी रहेगी तो फिर समाज को राजनीतिक दलों और राजनेताओं की असलियत का ज्ञान कैसे होगा? राजनैतिक अज्ञानता के कारण मनुवादियों की धोती धोने वाले और मनुवादियों की जूतियां उठाने वाले लोगों को आरक्षित क्षेत्रों से उम्मीदवार बनाया जाता है! जो समाज की नहीं अपनी पार्टियों की चिंता करते हैं। येन केन प्रकारेण जुटाये जाने वाले अपने वोटों की चिंता करते हैं। ऐसे में विचारणीय विषय यह होना चाहिए कि यदि आम जनता को राजनीति की हकीकत का ज्ञान ही नहीं करवाया जायेगा तो फिर वंचित, शोषित और पिछड़े तबकों के हकों की रक्षा करने वाले सच्चे राजनेताओं का उद्भव (जन्म) कैसे होगा?

12 अक्टूबर, 2014 को जयपुर में आयोजित उक्त मीणा-मीना मुद्दे के विरोध में आयोजित धरने कार्यक्रम का मैं साक्षी रहा। जिसमें मीणा-मीना मुद्दे पर खूब सार्थक और निरर्थक भाषण बाजी भी हुई। दबी जुबान में राजनैतिक बातें भी कही गयी। कभी दबी तो कभी ऊंची आवाज में सरकार को भी ललकारा गया। मनुवादियों द्वारा संचालित आरक्षण विरोधी 'समानता मंच' की बात भी इक्का दुक्का वक्ताओं ने उठायी। जिसे मंच तथा धराना आयोजकों की और से कोई खास तबज्जो नहीं दी। अर्थात 'समानता मंच' के विरोध को समर्थन नहीं मिला। यही नहीं बल्कि सबसे दुखद विषय तो ये रहा कि आरक्षित वर्गों का जो असली दुश्मन है, अर्थात मनुवाद, उसके बारे में एक शब्द भी किसी भी वक्ता ने नहीं बोला। 

अभी तक देखा जाता था कि राजनेता मनुवाद के खिलाफ बोलने से कतराते थे या इस मुद्दे पर चुप रहते थे तो आम लोग कहते थे कि राजनेता वोटों के चक्कर में मनुवाद के खिलाफ नहीं बोलते। मगर मीणा समाज के हकों की बात करने वाले मीणा समाज के कथित समाज सेवक भी इस बारे में केवल चुप ही नहीं दिखे, बल्कि इस मुद्दे से जानबूझकर बचते भी दिखे। मैंने मंच पर अनेकों से इस बारे में निजी तौर पर चर्चा भी की, तो सबने माना कि मनुवाद ही आरक्षण का असली दुश्मन है, मगर बिना कोई ठोस कारण या वजह के सब के सब मनुवाद के खिलाफ बोलने से बचते और डरे-सहमे नजर आये। ऐसे में मेरे मन में दो सवाल उठते हैं-

क्या मीणा समाज के समाज सेवकों को मनुवादियों से डर लगता है?

या

समाज सेवकों के वेश में भावी मनुवादी जन प्रतिनिधि तैयार हो रहे हैं?